Thursday, June 4, 2026
पांडित्य
पांडित्य पांडित्य से बचना। पांडित्य जहर है । कैंसर से भी भयानक बीमारी। पांडित्य का रोग एकबार पकड ले तो फिर छूटना मुश्किल है। कैंसर का इलाज है, पांडित्य का नहीं। कैंसर का इलाज aaj नहीं है तो कल हो जायगा, लेकिन पांडित्य का इलाज न है , न कभी रहा है और न कभी हो सकेगा। कैंसर तो शरीर को मरता है, लेकिन पांडित्य आत्मा को ही मर देता है।
Friday, October 14, 2022
सच्चे साधक को तप अग्नि में खुद को पकाना पड़ता है
सच्चा एक बार एक महात्मा अपने शिष्यों को साधक के बारे में समझा रहे थे कि साधक तो पक्का ही बनना चाहिए, कच्चा साधक किस काम का? कच्चे-पक्के साधक की बात सुनकर शिष्य के मन में एक नया सवाल उठा। उसने पूछा आखिर, ‘गुरुजी, पक्का साधक कैसे बनते हैं?’ गुरुजी मुस्कुराए और बोले, ‘बेटा, हलवाई रोज कई तरह की मिठाइयां बनाता है, जो एक से बढ़कर एक स्वादिष्ट होती हैं।’ शिष्य बोला, ‘पर साधक और हलवाई का क्या संबंध?’
गुरुजी बोले, ‘बेटा, साधक भी हलवाई की तरह ही है। जिस तरह हलवाई मिठाइयों को धीरे-धीरे पकाता है, वैसे ही साधक को भी साधना से स्वयं को पकाना पड़ता है। जिस तरह हलवे में सभी जरूरी चीजें डालने के बाद भी जब तक हलवा कच्चा है, उसका स्वाद अच्छा नहीं लगता, उसी तरह एक साधक चाहे जितना ज्ञान जुटा ले, कर्मकांड कर ले, जब तक वह स्मरण-भजन की अग्नि में नहीं तपता, तब तक वह कच्चा ही रहता है। जिस तरह मिठाई को अच्छे से पकाने के लिए लगातार उसका ध्यान रखना पड़ता है, उसी तरह साधक को भी अपनी चौकीदारी करनी चाहिए।’
गुरुजी बोले, ‘जब पकते-पकते हलवे में से खुशबू आने लगे और उसे खाने में आनंद मिले, तब उसे पका हुआ हलवा कहते हैं। उसी तरह जब साधना, साधक और साध्य, तीनों एक हो जाएं।
Saturday, September 12, 2020
मैंं कहता आंखन देखी
तुम्हारे जो भी तथाकथित गुरु हैं...वटवृक्ष हैं... उनके प्रति तुम्हारे जो विश्वास, श्रद्धाएं, निष्ठाएं और प्रतिबद्धताएं हैं, अत्यंत ही गहरे असुरक्षा के भाव और भय से पैदा हुए हैं...तुम सदैव इस भय से ग्रस्त रहे हो कि, यदि तुमको किसी गुरु, वटवृक्ष की छत्र-छाया या सुरक्षा नहीं मिली तो तुम पनप नहीं पाओगे...तुम सुरक्षित नहीं रह सकोगे...तुमको क्या लगता है कि, जब भी कोई समस्याओं और मुसीबतों के झंझावत तुम्हारे ऊपर आएंगे, तो इन वटवृक्षों के सायों में तुम सुरक्षित रह पाओगे...ये वटवृक्ष तुमको बचा लेंगे...लेकिन यह तुम्हारी बड़ी भूल है...तुम यह नहीं जानते कि इन वटवृक्षों के नीचे कभी कोई दूसरा वृक्ष न हरा-भरा रह सका है...और न ही अपने मौलिक स्वरूप में पनप सका है... इन वटवृक्षों का अस्तित्व ही तुम्हारे सह अस्तित्व या कहो तुम्हारे नीचे खड़े होने पर टिका हुआ है...तुम्हारी अज्ञानता और इनके प्रति तुम्हारे अंधविश्वास से ही इनका अस्तित्व है...तुम्हारे अंधविश्वास की ताकत पाकर ही इन्होंने परम सत्ता के समानान्तर अपनी अलग सत्ता का निर्माण किया है...क्या तुम जानते हो कि, तुम जो हो, जिस दिन तुम यह जान लेते हो...अनुभूत कर लेते हो...उस दिन ही इन वटवृक्षों के प्रति तुम्हारे अंध विश्वासों, श्रद्धाओं और प्रतिबद्धताओं के शिखर स्वत: तुम्हारे भीतर से टूटकर बिखर जाते हैं...।
Friday, September 11, 2020
मैं कहता आंखन देखी
संसार में आंखों से दिखाई देनी वाली प्रत्येक चीज नाशवान है.. और ये तुम्हारी नहीं हैं...ये शरीर, ये परिवार, ये दौलत-शौहरत, ये मकान-दुकान...और जो भी तुमने पास संग्रहित किया हुआ है... ये सब तुम्हारे दुनिया में आने के पहले किसी और का था ...और दुनिया से विदा हो जाने के बाद निश्चित तौर पर किसी और का हो जाएगा...यह सब किराएदारी पर तुमको मिला है....यही नहीं, इसके बाद भी हर वो चीज तुमको मिली, जिसकी तुमने कुदरत से इच्छा-अनिच्छा में चाहत की...क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि, तुमने जब-जब जो-जो चाहा वो सब भी कुदरत ने देर-अबेर तुमको दिया..क्या यह भी सच नहीं है कि, तुमने कुदरत प्रदत्त और उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई हर चीज पर अपना नाम लिख लिया है...जो तुम्हारी कभी थी ही नहीं...उन्हें तुमने मेरा-मेरा कहना शुरू कर दिया...क्या तुमको इसका बोध है...?
Thursday, September 10, 2020
मैं कहता आंखन देखी
Tuesday, September 8, 2020
लगोंट में अटका ब्रह्मचर्य
मैं कहता आंखन देखी
संत-महात्माओं द्वारा हमेशा से यही कहा जा रहा है अपने भीतर की आध्यात्मिक सिद्धियां जगाना है.... ईश्वर को पाना है, तो ब्रह्मचर्य के साथ (स्त्री के बिना) जीने का अभ्यास करो...स्त्री से दूर रहो...उसका संसर्ग तो दूर, उसकी परछाई से भी फासला रखकर चलो...सामने से यदि कलावती-लीलावती आ रही है...तो सिर नीचे करके निकलो...कहीं जाओ तो कसकर लंगोट बांधकर निकलो...वरना ब्रह्मचर्य भंग हो सकता है...इन्होंने जैसे ब्रह्मचर्य को जाना ही नहीं...इनके अनुसार ब्रह्मचर्य के मार्ग में कोई सबसे बड़ी बाधा है तो स्त्री है... स्त्री नरक का द्वार है... इन्होंने ब्रह्म को जैसे लगोंट में अटका दिया...।
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