तुम्हारे जो भी तथाकथित गुरु हैं...वटवृक्ष हैं... उनके प्रति तुम्हारे जो विश्वास, श्रद्धाएं, निष्ठाएं और प्रतिबद्धताएं हैं, अत्यंत ही गहरे असुरक्षा के भाव और भय से पैदा हुए हैं...तुम सदैव इस भय से ग्रस्त रहे हो कि, यदि तुमको किसी गुरु, वटवृक्ष की छत्र-छाया या सुरक्षा नहीं मिली तो तुम पनप नहीं पाओगे...तुम सुरक्षित नहीं रह सकोगे...तुमको क्या लगता है कि, जब भी कोई समस्याओं और मुसीबतों के झंझावत तुम्हारे ऊपर आएंगे, तो इन वटवृक्षों के सायों में तुम सुरक्षित रह पाओगे...ये वटवृक्ष तुमको बचा लेंगे...लेकिन यह तुम्हारी बड़ी भूल है...तुम यह नहीं जानते कि इन वटवृक्षों के नीचे कभी कोई दूसरा वृक्ष न हरा-भरा रह सका है...और न ही अपने मौलिक स्वरूप में पनप सका है... इन वटवृक्षों का अस्तित्व ही तुम्हारे सह अस्तित्व या कहो तुम्हारे नीचे खड़े होने पर टिका हुआ है...तुम्हारी अज्ञानता और इनके प्रति तुम्हारे अंधविश्वास से ही इनका अस्तित्व है...तुम्हारे अंधविश्वास की ताकत पाकर ही इन्होंने परम सत्ता के समानान्तर अपनी अलग सत्ता का निर्माण किया है...क्या तुम जानते हो कि, तुम जो हो, जिस दिन तुम यह जान लेते हो...अनुभूत कर लेते हो...उस दिन ही इन वटवृक्षों के प्रति तुम्हारे अंध विश्वासों, श्रद्धाओं और प्रतिबद्धताओं के शिखर स्वत: तुम्हारे भीतर से टूटकर बिखर जाते हैं...।
Saturday, September 12, 2020
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